कविता

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पूनम जी का प्रयास

यहाँ प्रस्तुत रचना में हमने विभिन्न शब्दों के द्विअर्थी यानि यमक अलंकार के प्रयोग का प्रयास किया है। आप पढ़ कर अनुक्रिया में बताएं कितना सफल‌ है हमारा प्रयास —

मन के जीते जीत है, मन के हारे ‘हार’
मन से हार ना मानना, चाहे शूल मिले या ‘हार’।

स्व ‘कर’ पर कर विश्वास, स्वकर्म पर ‘कर’ विश्वास
स्व ‘कर’ ही ज्योति हैं, स्वकर्म ही प्रकाश।

अपने ‘मान’ को सदा सबसे ऊंचा ‘मान’
‘मान’ बिन सब शून्य है चाहे हो सुखों की खान।

संघर्षों की प्रचंड तपिश से जब ‘जल’ जाए तन-मन
धैर्य संयम के मृदु ‘जल’ से शीतल करना अंतर्मन-जीवन।

जीवन की परीक्षाओं में दृढ़संकल्प के ‘तप’ से जूझ
‘तप’ तप के ही बन जाता जाता है कुंदन स्वरूप।

मोह-माया, ‘काम’, लोभ, धन-दौलत कुछ ना आता ‘काम’
सांसारिक प्रपंचों से विमुख हो रखना ‘काम’ से काम।

‘जमा’ पूंजी का क्या करेगा, कुछ ना जाना साथ
‘जमा’ आसन जग में, यहाँ हम अस्थायी मेहमान।

संघर्षों का कर सामना, उससे दूर मत ‘भाग’
मिलेगा कभी ना कभी तेरी किस्मत का जो है ‘भाग’।

बिना ‘फल’ की इच्छा के, कर्म को बना साधना
“कर्मण्येवाधिकारस्ते” हो ‘फल’ को लक्ष्य ना मानना।

जीवन का जो मंथन कर ले, समझ ले आत्म का ‘अर्थ’
क्षणभंगुर उसको द्रव्य धन ‘फल’ तृष्णा का रह न जाता अर्थ।

मन का कलुष ‘घटा’ के अंतस रख निर्मल
जैसे ‘घटा’ की कालिमा बरस के हो जाती स्वच्छ नवल-धवल।

सबसे जब से दूर हुए, खुद के हो गए ‘पास’
किसी के अवमूल्यन में नहीं, स्वमूल्यन में हो गए ‘पास’।

जहां ‘मत’ और मन ना मिले, वहां से रहना तू निर्लिप्त
जहां स्वमूल्य की हो अवमानना, वहाँ ‘मत’ होना व्यर्थ खर्च।

स्वरचित — पूनम अरोड़ा