संस्कार एवं परवरिश की पाठशाला पर कार्यशाला
बच्चों में तेजी से बढ़ते मोबाइल एडिक्शन, जिद्दीपन और गुस्से की प्रवृत्ति को देखते हुए होली चाइल्ड पब्लिक इंटर कॉलेज, जडौदा, मुजफ्फरनगर में अभिभावकों के लिए “संस्कार एवं परवरिश की पाठशाला” विषय पर एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में “परवरिश की पाठशाला” के विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) अनिल कश्यप योगी एवं श्रीमती रितु कश्यप मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे, जबकि सम्मानित अतिथि के रूप में डॉ. राजीव कुमार को आमंत्रित किया गया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रवेंद्र दहिया ने कहा कि आज बच्चों में मोबाइल की लत, जिद्दीपन और आक्रामक व्यवहार सामान्य समस्या बन चुकी है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम से ध्यान क्षमता में कमी, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और मोटापा जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। इसी चिंता को देखते हुए विद्यालय प्रबंधन ने अभिभावकों के लिए इस कार्यशाला का आयोजन किया।

सम्मानित अतिथि डॉ. राजीव कुमार ने सोशल मीडिया की बढ़ती लत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज सूचना क्रांति ने जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है, लेकिन इसके साथ पारिवारिक संवाद कम हुआ है। उन्होंने बताया कि एक बच्चे के जीवन के पहले 7 वर्ष उसके मस्तिष्क विकास की नींव रखते हैं। यदि इन वर्षों में उसे भावनात्मक सुरक्षा और पर्याप्त समय नहीं मिला, तो उसका प्रभाव जीवनभर रहता है।

कार्यशाला में “परवरिश की पाठशाला” के विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) अनिल कश्यप योगी ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हुए बताया कि न्यूरोसाइंस के अनुसार 0 से 7 वर्ष की आयु में बच्चे का मस्तिष्क 80–90 प्रतिशत तक विकसित हो जाता है। इन शुरुआती वर्षों में बच्चों से बातें करना, उन्हें कहानियाँ सुनाना, खेल-कूद कराना और उनके साथ मस्ती करना उनके मस्तिष्क के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। लेकिन आज के अभिभावकों के पास न तो पर्याप्त समय है और न ही उतनी ऊर्जा कि वे बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिता सकें। परिणामस्वरूप, वे बच्चों को व्यस्त रखने के लिए अक्सर मोबाइल थमा देते हैं।
बच्चों को मोबाइल देना प्रारंभ में अभिभावकों को कुछ समय के लिए शांति अवश्य दे देता है, किंतु दीर्घकाल में यह डोपामिन-आधारित आदत (एडिक्शन पैटर्न) बच्चों को मोबाइल का आदी बना देती है। मोबाइल से मिलने वाला त्वरित सुख (तुरंत संतुष्टि) बच्चों की धैर्य क्षमता को कम कर देता है। डॉ. योगी ने कहा, “जब माता-पिता समय नहीं देते, तो मोबाइल ‘डिजिटल बेबीसिटर’ बन जाता है।” उन्होंने अभिभावकों को पाँच महत्वपूर्ण सुझाव दिए—
- 0–5 वर्ष तक बच्चों को स्क्रीन से यथासंभव दूर रखें।
- घर में “टेक-फ्री जोन” निर्धारित करें।
- बच्चों को आउटडोर खेल और रचनात्मक गतिविधियों में लगाएँ।
- स्वयं मोबाइल उपयोग में अनुशासन रखें (रोल मॉडल बनें)।
- बच्चे के गुस्से को समझें, उसे दबाएँ नहीं।
कार्यशाला में वक्ताओं ने बच्चों की परवरिश में माँ की भूमिका पर भी विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आज की माताएँ शारीरिक और मानसिक थकान से गुजर रही हैं। कई महिलाएँ तनाव, अवसाद तथा भावनात्मक दबाव जैसी समस्याओं का सामना कर रही हैं। माँ की मानसिक स्थिति सीधे बच्चे की भावनात्मक स्थिति को प्रभावित करती है। यदि माँ को भावनात्मक समर्थन नहीं मिलता, तो बच्चे की परवरिश संतुलित नहीं हो पाती। बढ़ती तलाक दर और पारिवारिक तनाव का प्रभाव भी बच्चों के व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
श्रीमती रितु कश्यप ने कहा, “माँ केवल पालनकर्ता नहीं, बल्कि बच्चे की प्रथम गुरु होती है। इसलिए परवरिश की शुरुआत माँ के मानसिक स्वास्थ्य से होती है।” उन्होंने माताओं के लिए सुझाव दिए— प्रतिदिन 20–30 मिनट ‘मी-टाइम’ अवश्य निकालें, पति-पत्नी आपसी संवाद को मजबूत करें, आवश्यकता पड़ने पर काउंसलिंग लेने में संकोच न करें, तथा बच्चों के सामने झगड़े से बचें।
कार्यशाला का एक अत्यंत प्रभावशाली और भावनात्मक क्षण तब आया, जब “परवरिश की पाठशाला” की ओर से आई 9 वर्षीय बालिका निर्मिता ने एक विशेष कहानी प्रस्तुत की। उस कहानी में यह दर्शाया गया कि यदि एक बच्चा मशीन की तरह व्यवहार करे— मम्मी-पापा की हर बात तुरंत माने, कभी जिद्द न करे, कभी गलती न करे, कभी शरारत न करे और हमेशा परफेक्ट बना रहे— तो शायद उसके बचपन से जुड़ी यादें ही गायब हो जाएँ। कहानी का मुख्य संदेश था, “अगर बच्चा मशीन की तरह व्यवहार करेगा, तो बचपन की मासूम शरारतें और हँसी की यादें कहाँ से आएँगी?” निर्मिता ने कहा कि बच्चों की छोटी-छोटी शरारतें, रोजमर्रा की जिद्द, गुस्सा और नादानियाँ साधारण घटनाएँ नहीं होतीं, बल्कि वही भविष्य की वे यादें बनती हैं जिन्हें माता-पिता वर्षों बाद मुस्कुराकर याद करते हैं।
इस संदेश ने उपस्थित अभिभावकों को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया कि वे कहीं अपने बच्चों से “परफेक्ट मशीन” बनने की अपेक्षा तो नहीं कर रहे हैं। कार्यशाला के अंत में विद्यालय द्वारा एक लकी ड्रा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें अभिभावकों— यस्मिन, अंकित, सुमन, शालिनी, सचिन, पूनम, रुबीना, सीमा, ज्योति एवं राजेश— को पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया।
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