तीज पर कविता
उलझन सुलझन

तीज पर कविता

अनुप्रास अलंकार में ‘स’ अक्षर से सजी तीज पर कविता

सावन सुरंगा मास सुमधुर,

समूची वसुधा सजी दुल्हन-सी सुंदर।

 

सूरज की सुनहरी सुबह सुहानी,

सनन सनन पुर्वा चले, संध्या मस्तानी।

 

सपनों को साकार करती सौंदर्य की पराकाष्ठा,

सुहागिन करती तीज का व्रत, सच्ची उनकी निष्ठा।

 

सतरंगी चुनर ओढ़, सजाए मेहंदी हाथ,

सिंदूर से सजी माँग, मांगे सातों जन्मों का साथ।

 

साया बनकर चलें एक-दूजे के संग,

स्नेह-सुधा बरसाए, सुख के सजे हो रंग।

 

सिंजारे पर सोलह श्रृंगार कर सखियों संग झूला झूलती,

सातुड़ी तीज पर सत्तू का भोग लगा, नीमड़ी को पूजती।

 

सदाशिव संग गौरा माता,

सुख-सौभाग्य से भर दो नाता।

 

स्नेह-सुमन से सजे मन आंगन,

सदा सुखमय रहे हमारा दाम्पत्य जीवन।

रचनाकार

राखी पलोड

स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन

जहानाबाद महिला प्रकोष्ठ

Prastutit

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