“फतुआ गुर्जर के बलिदान दिवस पर मेरी सहभागिता” — डॉ. अशोक कुमार चौधरी का आत्मकथ्य
अभी कुछ समय पूर्व मेरठ में चिश्ती पहलवान के कब्रिस्तान के निकट मौलाना सालिम गुर्जर के निवास स्थान पर ‘हमारे पुरखे न्यास’ के तत्वावधान में 1857 की क्रांति के अमर शहीद फतुआ गुर्जर के बलिदान दिवस पर आयोजित विचार गोष्ठी में मुझे सहभागी होने और मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखने का अवसर प्राप्त हुआ। मेरे लिए यह केवल एक कार्यक्रम में सहभागिता नहीं, बल्कि अपने इतिहास के एक ऐसे अध्याय से जुड़ने का अवसर था, जिसे स्मरण करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
गोष्ठी की अध्यक्षता इंचौली के एडवोकेट इलियास जी ने की तथा संचालन मौलाना शान मोहम्मद जी ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में जिला बिजनौर के होमगार्ड के जिला कमांडेंट एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डा. वेदपाल चपराना जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उनके विचारों ने 1857 के संघर्ष को केवल इतिहास की एक घटना के रूप में देखने के बजाय उसके पीछे छिपी स्वतंत्रता की आकांक्षा, स्वाभिमान और जनएकता को समझने की प्रेरणा दी।
मुख्य वक्ता के रूप में मैंने सन् 1857 की क्रांति के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालते हुए विशेष रूप से फतुआ गुर्जर के संघर्ष और बलिदान को केंद्र में रखा। मेरा मानना है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल मेरठ, दिल्ली, कानपुर, झांसी या अन्य बड़े केंद्रों की घटनाओं तक सीमित नहीं है। इसके पीछे गांवों और कस्बों में उठी वह जनचेतना भी थी, जिसमें असंख्य स्थानीय वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
फतुआ गुर्जर इसी जनसंघर्ष और प्रतिरोध की उस परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जिनका बलिदान स्थानीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है। उनके जीवन और संघर्ष को स्मरण करने का अर्थ केवल एक व्यक्ति को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उन तमाम ज्ञात-अज्ञात वीरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है, जिन्होंने स्वतंत्रता की लौ को बुझने नहीं दिया।
अपने संबोधन में मैंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इतिहास तभी सार्थक होता है, जब वह आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है। यदि हम अपने स्थानीय शहीदों, अपने गांवों और अपने अंचल के स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को विस्मृत कर देंगे, तो हमारी नई पीढ़ी स्वतंत्रता के वास्तविक मूल्य और उसके पीछे दिए गए बलिदानों को पूरी तरह समझ नहीं पाएगी। इसलिए फतुआ गुर्जर जैसे वीरों की स्मृति को दस्तावेजों, शोध, जनचर्चा और सामाजिक आयोजनों के माध्यम से जीवित रखना आवश्यक है।
गोष्ठी में न्यास के पदाधिकारी श्री योगेन्द्र त्यागी जी, महिला प्रतिनिधि डा. शहजादी जी तथा संयोजक नूरुद्दीन चौहान जी ने भी अपने विचार रखे। सभी वक्ताओं की बातों में अपने इतिहास और पुरखों के प्रति सम्मान तथा नई पीढ़ी को उससे जोड़ने की चिंता स्पष्ट दिखाई दी।
कार्यक्रम का वातावरण मेरे लिए विशेष रूप से भावपूर्ण रहा। मुझे लगा कि ऐसे आयोजन इतिहास को केवल पुस्तकों के पन्नों से निकालकर समाज की स्मृति और चेतना का हिस्सा बनाते हैं। फतुआ गुर्जर के बलिदान दिवस पर एकत्र होकर हमने वस्तुतः अपने उन पुरखों को नमन किया, जिन्होंने अपने वर्तमान का बलिदान देकर हमारे भविष्य की नींव रखी।
गोष्ठी के अंत में अध्यक्ष एडवोकेट इलियास जी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित गणमान्य नागरिकों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम का समापन किया। मोहम्मद कुर्बान जी सहित अनेक गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाया।
मेरे लिए इस आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि इतिहास केवल याद करने की वस्तु नहीं, उससे सीखने की जिम्मेदारी भी है। फतुआ गुर्जर का बलिदान हमें अपने स्वाभिमान, स्वतंत्रता और सामाजिक एकता के मूल्यों को समझने की प्रेरणा देता है। ऐसे वीरों की स्मृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मैं ‘हमारे पुरखे न्यास’ का आभार व्यक्त करता हूं कि उसने फतुआ गुर्जर जैसे अमर शहीद की स्मृति को जनचेतना से जोड़ने का यह सार्थक प्रयास किया और मुझे इस ऐतिहासिक अवसर पर अपने विचार रखने का अवसर प्रदान किया।
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प्रस्तुति

डॉ अशोक कुमार चौधरी
