बाल-मनोविज्ञान पर संगोष्ठी
नूरनगर। राष्ट्रीय इण्टर कॉलेज नूरनगर मेरठ (उत्तर प्रदेश, भारत) में आज शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा तक सीमित न रखते हुए विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, संस्कार निर्माण तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा को अधिक प्रभावी, संवेदनशील और समाजोपयोगी बनाने के साथ-साथ शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों के बीच बेहतर संवाद की आवश्यकता पर विचार करना था।
संगोष्ठी में आचार्य देवानन्द जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी भी विद्यालय की वास्तविक पहचान केवल उसके परीक्षा परिणामों से नहीं, बल्कि वहाँ से निकलने वाले विद्यार्थियों के संस्कार, व्यवहार, विचार और सामाजिक जिम्मेदारी से होती है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों में ज्ञान के साथ अनुशासन, संवेदनशीलता, जिम्मेदारी, आत्मविश्वास और अपनी संस्कृति तथा मूल्यों के प्रति सम्मान विकसित करे।
उन्होंने विद्यालय में संस्कृति और शिक्षा की गुणवत्ता को ऊपर उठाने के लिए शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों को अधिक आत्मीय बनाने, कक्षा-कक्ष के वातावरण को संवादपरक बनाने तथा विद्यार्थियों की व्यक्तिगत क्षमताओं और रुचियों को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चा अलग प्रकृति, क्षमता और पारिवारिक परिवेश लेकर विद्यालय आता है। इसलिए सभी विद्यार्थियों से एक जैसी अपेक्षा करने के बजाय उनकी व्यक्तिगत विशेषताओं को समझना आवश्यक है।
आचार्य देवानन्द जी ने अभिभावकों से संवाद के विषय में कहा कि शिक्षक और अभिभावक एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य के सहयात्री हैं। अभिभावकों से बातचीत करते समय केवल बच्चे की कमियों की चर्चा करने के बजाय उसकी उपलब्धियों, रुचियों, कठिनाइयों और संभावनाओं पर भी सकारात्मक संवाद होना चाहिए। जब विद्यालय और परिवार के बीच विश्वास तथा निरंतर संवाद स्थापित होता है, तभी बच्चे के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होता है।
संगोष्ठी में बच्चों के मानसिक स्तर और उनकी भावनात्मक आवश्यकताओं को पहचानने पर भी विशेष चर्चा हुई। वक्ता ने कहा कि कई बार बच्चे की पढ़ाई में गिरावट, चिड़चिड़ापन, एकांतप्रियता, अत्यधिक मौन या अनुशासनहीनता के पीछे कोई मानसिक, पारिवारिक अथवा सामाजिक कारण हो सकता है। ऐसे संकेतों को केवल शरारत या कमजोरी मानकर दंडित करने के बजाय संवेदनशीलता और संवाद के माध्यम से समझने की आवश्यकता है। शिक्षक यदि बच्चों को ध्यान से सुनें और उनके व्यवहार में होने वाले बदलावों को समझें, तो अनेक समस्याओं का समय रहते समाधान किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि अच्छा मनुष्य और जिम्मेदार नागरिक बनना भी है। विद्यालय में नैतिक मूल्यों, भारतीय संस्कृति, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण चेतना, सहयोग की भावना तथा लोकतांत्रिक व्यवहार जैसे विषयों को व्यवहारिक रूप में बच्चों के जीवन से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में विद्यालय के समस्त शिक्षक-शिक्षिकाओं ने सक्रिय सहभागिता की और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श किया। शिक्षकों ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यालय, परिवार और समाज के बीच समन्वय स्थापित कर ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।
संगोष्ठी का व्यापक संदेश यही रहा कि एक बेहतर विद्यालय केवल अच्छे परिणाम देने वाला संस्थान नहीं, बल्कि बेहतर पीढ़ी तैयार करने वाला केंद्र होता है। इसके लिए शिक्षक का ज्ञान, अभिभावक का सहयोग, समाज की सकारात्मक भूमिका और विद्यार्थी की सक्रिय भागीदारी—चारों का समन्वय आवश्यक है।
राष्ट्रीय इण्टर कॉलेज नुरनगर में आयोजित यह संगोष्ठी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रही कि इसमें शिक्षा को व्यक्ति के साथ-साथ परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण से जोड़कर देखने का संदेश दिया गया। उपस्थित शिक्षकों ने ऐसे संवाद और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भविष्य में भी निरंतर आयोजित किए जाने की आवश्यकता व्यक्त की, ताकि विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ संस्कार, संवेदना और सामाजिक चेतना के सशक्त केंद्र के रूप में विकसित हो सके।
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