उल्टा-सीधा
हे भगवान! कहां फंसाया आज..
ऐसे समझदार-नासमझ,
उल्टे-सीधे लोगों के बीच में..
कहते हैं लिखो कुछ भी,
आगे-पीछे कुछ सोचे बगैर..
भले ही दिन-रात एक हो जाएं,
कुछ भी ऊपर-नीचे, दायें-बायें..
सही-गलत भले हो जाए,
पर काट-छाँट के बाद लिखना तो है जरूरी..
देव-दानवों के समुद्र मंथन में भी,
नहीं आई रही होगी ऐसी शंका-कुशंका..
जीवन-मरण का प्रश्न तो था ही,
पर मान-अपमान पर भी बात बन आई थी..
आसान सी डगर में,
धूप-छांव सी चल रही थी मेरी जिंदगी..
और कहां थी हमें भी,
अच्छे-बुरे की कोई पहचान..
बनाया है जब दोस्त-दुश्मनों को,
तो यारी-दुश्मनी तो निभानी ही पड़ेगी..
लाभ-हानि, हार-जीत और आरंभ-अंत से,
परे होता है ये वाट्सैपिया प्यार का रिश्ता..
छोटे-बड़े, सच्चे-झूठे, भोले-मक्कार, खट्टे-मीठे भले हों कोई,
पर सुख-दु:ख के भी सच्चे साथी होते हैं ये प्यारे से यार..
इनका आदेश नख-शिख से स्वीकार है हमें,
हम भी तो बता दें कि हम आपके दुश्मन-दोस्त नहीं..
बस यारों के यार हैं..
सृजक

सुषमा अग्रवाल
नागपुर (महाराष्ट्र)
प्रस्तुति

