उलझन से सुलझन
मैं नाराज़ नहीं होती आजकल,
बस कुछ दिनों तक
खामोश हो जाती हूँ।
क्योंकि जिन बातों को लोग
कहकर भूल जाते हैं,
उन्हीं बातों में मैं
सालों तक उलझी रह जाती हूँ।
कोई बात कह देता है सहज ही,
और आगे बढ़ जाता है,
मगर वही बात
मेरे भीतर उतरकर
न जाने कितने सवाल छोड़ जाती है।
मैं उन्हें मिटाती नहीं,
बस समझने की कोशिश करती हूँ—
शब्दों के पीछे छिपे भाव,
खामोशी के पीछे छिपे अर्थ,
और कभी-कभी
अपने ही भीतर छिपी
उस बेचैनी को।
शायद मेरी आदत है
हर बात को गहराई से महसूस करना,
हर रिश्ते को
पूरी सच्चाई से जीना,
और इसलिए
छोटी-सी बात भी
मन में बड़ी हो जाती है।
कई बार
मैंने दूसरों की कही बातों से ज्यादा
अपने ही सवालों से खुद को दु:ख दिया है।
बार-बार सोचा—
क्या मुझसे कोई भूल हुई?
क्या मुझे कुछ और कहना चाहिए था?
क्या मैं किसी को समझ नहीं पाई?
क्या सचमुच कमी मुझमें ही थी?
और इन सवालों के बीच
मैं एक बात भूल गई—
हर बात का उत्तर
मेरे भीतर होना जरूरी नहीं।
हर मनुष्य का अपना संघर्ष है,
अपना स्वभाव है,
अपना मौन है,
अपना आकाश है।
हर उदासी का कारण मैं नहीं,
हर खामोशी की जिम्मेदारी मेरी नहीं,
और हर बदलते भाव को
अपनी कमी मान लेना
न्याय भी तो नहीं।
हाँ, मुझसे गलतियाँ होती हैं,
मैं पूर्ण नहीं हूँ।
पर मेरी गलतियाँ ही
मेरी पूरी पहचान नहीं।
मेरी नीयत भी है,
मेरी कोशिश भी है,
मेरी संवेदना भी है,
और हर बार बेहतर बनने की
एक सच्ची इच्छा भी।
अब मैं
हर बात को अपने भीतर
सालों तक नहीं रखूँगी।
जो बात समझने योग्य होगी,
उसे समझूँगी।
जो गलती मेरी होगी,
उसे स्वीकार करूँगी।
और जो मेरे हाथ में नहीं होगी,
उसे धीरे से
वहीं छोड़ दूँगी।
अब मेरी खामोशी
किसी से नाराज़गी नहीं,
खुद से मिलने का समय होगी।
मैं भागूँगी नहीं अपनी उलझनों से,
उन्हें एक-एक करके
सुलझाऊँगी।
क्योंकि मैंने जाना है—
मन को सुकून
हर सवाल का जवाब मिलने से नहीं,
कुछ सवालों को
छोड़ देना सीखने से भी मिलता है।
अब किसी के शब्द
मेरी कीमत तय नहीं करेंगे,
किसी की नाराज़गी
मुझे अपने अस्तित्व पर
सवाल करने को मजबूर नहीं करेगी।
मैं संवेदनशील हूँ—
इसलिए गहराई से महसूस करती हूँ।
मैं भावुक हूँ—
इसलिए बातें देर तक रहती हैं।
पर अब
मैं अपनी गहराई में डूबूँगी नहीं,
उसी गहराई से
अपने लिए रास्ता निकालूँगी।
कल तक
मैं अपनी ही उलझनों में
खुद को खोजती थी,
आज समझ रही हूँ—
हर उलझी हुई डोर
टूटने के लिए नहीं होती,
कुछ डोरें
सुलझकर हमें
हमसे मिलाने आती हैं।
इसलिए अब
मैं खुद को दोष नहीं दूँगी।
मैं सीखूँगी,
समझूँगी,
ठहरूँगी,
और फिर आगे बढ़ूँगी।
क्योंकि जीवन
हर बात को याद रखने का नाम नहीं,
कुछ बातों को समझकर
मुक्त कर देने का नाम भी है।
और शायद
मेरी सबसे बड़ी सुलझन यही है—
मैं हर किसी को खुश नहीं कर सकती,
हर मन को समझ नहीं सकती,
हर परिस्थिति बदल नहीं सकती।
लेकिन
मैं अपने मन को
हर बार थोड़ा और समझ सकती हूँ।
यही मेरी यात्रा है—
उलझन से सुलझन तक।

प्रस्तुति

