कविता

गुरु कृपा

कृपा गुरु की ऐसी बरसी,
जीवन का उद्धार हुआ ।
अपनी ममता के छाँव तले ,
ज्ञान का दीप है दिखलाया।।

अंधकार को दुर भगाकर ,
हृदय का संताप मिटाया ।
घट-घट में गुरु बसे हुए हैं,
स्वांसो में है वो ही समाया।।

भटकन का जब अन्त हुआ,
परमद्वार गुरु का पाया ।
तप्त ह्रदय मेरा शांत हुआ,
वचन गुरु का अपनाया ।।

गुरु चरणों में शीश नवाऊँ,
श्रद्धा सुमन मैं भेट चढ़ाउं ।
सत्संगत की राह चलाया,
जीने का है मार्ग दिखाया ।

रचनाकार

सुलोचना धनावत