गुरु कृपा
कृपा गुरु की ऐसी बरसी,
जीवन का उद्धार हुआ ।
अपनी ममता के छाँव तले ,
ज्ञान का दीप है दिखलाया।।
अंधकार को दुर भगाकर ,
हृदय का संताप मिटाया ।
घट-घट में गुरु बसे हुए हैं,
स्वांसो में है वो ही समाया।।
भटकन का जब अन्त हुआ,
परमद्वार गुरु का पाया ।
तप्त ह्रदय मेरा शांत हुआ,
वचन गुरु का अपनाया ।।
गुरु चरणों में शीश नवाऊँ,
श्रद्धा सुमन मैं भेट चढ़ाउं ।
सत्संगत की राह चलाया,
जीने का है मार्ग दिखाया ।
रचनाकार
सुलोचना धनावत
