प्रमिला जी के भाव

प्रमिला जी के भाव

चाँद से चंद बातें

चाँद से चंद बातें
शरद पूनम के चाँद संग
मैं देर तक बैठी रही,
श्रीकृष्ण के रूप माधुर्य को
चाँद से सुनती रही।
मैंने चाँद से पूछा,
क्या शरद पूनम की रात
तुम्हारी किरणों से अमृत झरता है?
क्या तुम्हारी शीतल चाँदनी में
मन का हर माधुर्य उतरता है?
चाँद मुस्कुराकर बोला,
तुमने यह कैसा प्रश्न किया,
जिस माधव के रूप को सुनकर
तुमने अपना मन अर्पण किया,
उनके मुख की आभा के आगे
मेरा उजियारा भी फीका है,
उनकी मोहक मुस्कान में ही
सारे जग का सुख समाया है।
मैंने फिर चाँद से पूछा,
क्या तुमने वह रास देखा है?
वृंदावन की पावन धरती पर
प्रेम का इतिहास देखा है?
जब मुरली की तान बजी थी,
जब यमुना भी ठहर गई थी,
क्या तुम्हारी चाँदनी में
हर गोपी कृष्णमय हुई थी?
चाँद बोला, हाँ, मैंने देखा,
वह अद्भुत, अलौकिक रात,
जहाँ प्रेम ही पूजा बन बैठा,
जहाँ भक्ति बनी थी सौगात।
हर गोपी के हृदय में कान्हा,
हर धड़कन में उनका नाम,
एक कृष्ण, पर रूप अनेक थे,
प्रेम बना था वृंदावन धाम।
मैंने कहा, ऐ चाँद ज़रा यह
मुझको भी समझा देना,
जिस प्रेम में स्वयं को खो दें,
उस प्रेम का अर्थ बता देना।
क्या प्रेम वही है, जो पाने की
हर पल अभिलाषा रखता है?
या प्रेम वही, जो दूर रहकर भी
मन में दीप जलाए रखता है?
चाँद ने धीरे से समझाया,
प्रेम न बंधन, प्रेम न व्यापार,
प्रेम समर्पण की भाषा है,
प्रेम ही जीवन का सार।
राधा के मन में श्याम बसे हैं,
श्याम के मन में राधा,
दो तन होकर एक आत्मा,
प्रेम की अनुपम परिभाषा।
मैं चुपचाप निहारती रही
चाँदनी में कान्हा की छवि,
मन के कोने-कोने में जैसे
उतर रही थी मधुर बाँसुरी।
आँखों में वृंदावन जागा,
हृदय में गूँजा राधे-श्याम,
चाँद से बातें करते-करते
होठों पर आया उनका नाम।
फिर मैंने चाँद से कहा,
जब अगली पूनम आएगी,
क्या मेरे मन की यह विरह-व्यथा
श्याम तलक पहुँचाएगी?
कह देना उनसे, हे मोहन,
एक भक्त तुम्हें बुलाती है,
तुम्हारे दर्शन की अभिलाषा
हर साँस में दोहराती है।
चाँद ने अपनी किरणों से
मेरे माथे को सहलाया,
जैसे कान्हा ने दूर कहीं से
मेरा संदेशा सुन पाया।
उस रात चाँद तो ढल गया,
पर मन में उजियारा रह गया,
श्रीकृष्ण के प्रेम का मीठा स्वर
मेरी आत्मा में बह गया।
अब जब भी पूनम आती है,
मैं चाँद से मिलने जाती हूँ,
चंद सवाल लेकर बैठती हूँ,
और कान्हा की बातें सुनती हूँ।

शरद पूर्णिमा का महारास

राधा-कृष्ण के प्रेम को समर्पित कविता

शरद पूर्णिमा की रात सुहानी,
चाँदनी में धरती नहाई।
यमुना तट पर बजे मुरलिया,
प्रेम की मधुर धुन छाई।

कदंब की डाली झूम उठी है,
महक उठी ब्रज की हर गली।
राधा के संग रास रचाने,
आए कुंज बिहारी वनमाली।

पायल छनके, घुँघरू बाजें,
प्रेम सुधा बरसाए श्याम।
राधा के मुख पर चंद्रमा दमके,
कृष्ण के अधरों पर मुस्कान।

चाँद निहारे रास की शोभा,
तारे करते प्रेम प्रणाम।
यमुना की लहरें गाएँ मिलकर,
राधे-राधे, श्याम-श्याम।

राधा प्रेम की अमर कहानी,
कृष्ण प्रेम का अनुपम सार।
एक हृदय की धड़कन राधा,
दूजे में मोहन का संसार।

नहीं अपेक्षा, नहीं कोई मोल,
प्रेम जहाँ निष्काम हुआ।
राधा-कृष्ण के दिव्य महारास में,
हर कण वृंदावन धाम हुआ।

आज भी शरद की चाँदनी में,
गूँज रही मुरली की तान।
मन की आँखें खोल के देखो,
रास रचाते नंदलाल।

राधा नाम प्रेम की भाषा,
कृष्ण नाम आनंद अपार।
शरद पूर्णिमा की पावन रजनी,
करती प्रेम-भक्ति का विस्तार।

राधे राधे! जय श्री राधा-कृष्ण!

कुछ मन के भाव

अपने मन की किताब
ऐसे व्यक्ति के पास ही
ख़ोलना जो पढ़ने के बाद
आपको समझ सके
रिश्ते वो बड़े नहीं होते
जो जन्म से जुड़े होते है
रिश्ते वो बड़े होते है
जो दिल से जुडे होते है
कुछ रिश्ते सच में
अनमोल होते हैं
उनकी कीमत नहीं
अहमियत होती है
क्योंकि ये जिंदगी के सबसे
खूबसूरत खज़ाने होते हैं
शरद पूर्णिमा पर खूब बधाईयां
शुभ मध्याह्न
प्रमिला त्रिवेदी

प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय संपादक, उलझन सुलझन, बेंगलुरु महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति

उलझन सुलझन