नवरात्रि में जौं (ज्वार) के दाने क्यूँ बोए जाते हैं?
हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार सृष्टि की शुरुआत के बाद पहली कृषि फसल (जौं) ही मानी गई है।
देवी का स्वागत करना, जौं को नये जीवन और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है, जब जौं अंकुरित होते हैं तो ये देवी की कृपा का प्रतीक मानते हैं आशा, श्रद्धा और विश्वास से घर में सुख-समृद्धि इससे मानते हैं।
जौं का उपयोग हमारी रसोई से लेकर कई सारी औषधियों में किया जाता है।
वैदिक काल में खाने के लिए बनने वाली लापसी जौं को सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है।
जौं बोने का वैज्ञानिक कारण
वैज्ञानिक बताते हैं कि ऋतु संधि के दौरान रोगाणुओं के हमले से रक्षित करने के लिए नवरात्रि मनाई जाती है।
दरअसल ऋतुओं के बदलने से व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, इसीलिए इन नौ दिनों में जो व्यक्ति सात्विक भोजन ग्रहण करता है उसकी इम्युनिटी बढ़ती है।
सृष्टि का पहला अनाज जौं
नवरात्रि दो ऋतुओं के संधि काल का नाम है। चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्रि। एक सर्दी व गर्मी तथा दूसरे गर्मी और सर्दी का संधि काल है।
दोनों ही ऋतुओं में रवि व खरीफ की फसल तैयार होती है। इसी कारण भूमि की गुणवत्ता को परखने के लिए जौं उगाए जाते हैं. इससे पता चलता है कि फसल कैसी होगी. यदि सभी अनाजों को एक साथ भूमि में उगाया जाए तो सबसे पहले जौं ही अंकुरित होकर बाहर आते हैं.
शास्त्रों उपनिषदों के अनुसार ईश्वर अन्न को मानते हैं. अन्न निंदा और उसके तिरस्कार के लिए निषेध किया गया है.
ऋग्वेद में बहुत से अन्न, का वर्णन किया गया है, जिसमे (यव) अर्थात जौं की गणना की गई है.
वसंत ऋतु में सभी फसलों के पत्ते झड़ने लगते हैं, लेकिन शक्ति से भरे हुए जौँ के पौधे दानों से भरे खड़े रहते हैं.
संस्कृत भाषा का (यव) शब्द ही (जव) उच्चारित होते हुए (जौं)बन गया है, जो धरती को उपजाऊ बनाने का सबसे अच्छा साधन उदाहरण

