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नए दौर की नारियाँ

लिख रहीं इतिहास नए दौर की नारियाँ
दौर-ए-उल्फत में हुईं बहुत सी रुसवाइयाँ
नहीं पाँव ज़मीं पर पंख लगा उड़तीं आसमां में
अब तोड़ रही हैं वो पैरों की सब बेड़ियाँ
अपने ज्ञान से लिख रही हैं नई कहानियाँ.

हर आदमी अकेला है और हैं ये तनहाइयाँ
इश्क-ए-बाजार में फिर भी छाई हैं खामोशियाँ
माना दौर नया है नहीं कोई किसी का यहाँ
उड़ा ले जाएंगी संघर्षों की गज़ब ये आँधियाँ.

आगाज़ नए दौर का गढ़तीं नई कहानियाँ
अकेले में जो बैठे हो गईं उनकी रुसवाइयाँ
गुनाहों को भी नहीं पता क्या चाहत उनकी
करम कर ले बंदे अच्छे काम आएँगी नेकियाँ.

गीता ठाकुर दिल्ली से ✍️

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🌟 इतिहास नहीं – भविष्य गढ़ती बेटियाँ 🌟

किसी भी अभिभावक, परिवार या समाज के लिए सबसे बड़ा सुखद क्षण तब जन्म लेता है, जब घर सँभालने वाली बेटियाँ – किशोरियाँ हों या युवतियाँ – अपने समर्पण, कर्म और सृजनशीलता से दुनिया में अलग पहचान बनाती हैं। जब उनका सफर ‘सपनों’ से निकलकर ‘यथार्थ’ की धरती पर विजय पताका लहराता है, तब वो क्षण केवल गर्व का नहीं, बल्कि एक नज़ीर बन जाता है – आने वाली पीढ़ियों के लिए राह दिखाने वाली मशाल बनकर।

यही मशाल आज रिया भाटी, कनिष्का बिधूड़ी और अनेक भारतीय बेटियों ने अपने साहस से जगाई है।

मेरठ की उभरती क्रिकेटर रिया भाटी ने 50 ओवर के मैच में 200 रन की आतिशी पारी खेलकर उत्तर प्रदेश अंडर-19 टीम में जगह बनाई। दूसरी ओर दिल्ली की कनिष्का बिधूड़ी, जिनके सपने दो बार आर्थिक तंगी से रुक गए थे, ने हार नहीं मानी और एशियन यूथ गेम्स में कुराश खेल में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। यह केवल दो जीत नहीं, बल्कि उन सभी बेटियों के सपनों का प्रतीक है जो सीमित साधनों के बीच असीम आकाश को छूना चाहती हैं।

लेकिन प्रेरणा का यह आकाश इससे भी विस्तृत है—

* हरिद्वार की रक्षिता हतवाल, जिसने उत्तराखंड सैनिक स्कूल की प्रवेश परीक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग में प्रथम स्थान हासिल किया। उसकी सफलता साबित करती है कि पहाड़ों की बेटियाँ केवल प्रकृति की नहीं, बल्कि भविष्य की भी निर्माता हैं।
* कशिश कसाना, जिसने यूपीएससी आहूत परीक्षा में प्रथम रैंक लाकर यह सिखाया कि कठिन परीक्षाएँ भी दृढ़ निश्चय के आगे झुकती हैं।
* सुनित भाटी की बेटी, जिसने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की एलएलएम परीक्षा में टॉप कर ज्ञान की शक्ति को नए मायने दिए।
* शैरी सिंह, जो गत वर्ष मिसेज यूनिवर्स बनीं – यह प्रमाण है कि गृहस्थी निभाने वाली स्त्री भी वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास से चमक सकती है।
* निर्मल डेढ़ा, जो दहेज के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन चला रही हैं – यह दर्शाती हैं कि सशक्तिकरण केवल सफलता नहीं, बल्कि समाज-सुधार की जिम्मेदारी भी है।
* ज्योति भड़ाना, जो शोध के क्षेत्र में नई दिशाएँ खोज रही हैं – यह याद दिलाती हैं कि विचार और ज्ञान का कोई लिंग नहीं होता।
* सोनिया सिंह, सहारनपुर की स्थानीय संपादिका, शरीर से अक्षम लेकिन विचारों से अडिग, अपने ‘उलझन सुलझन’ माध्यम से साबित करती हैं कि शक्ति शरीर नहीं, सोच में बसती है।
* रीना वर्मा, जो संवाद की सृजक हैं – शब्दों को आवाज़ और संवेदनाओं को समाज से जोड़ते हुए वह विचारों का एक मजबूत पुल बना रही हैं।

✨ क्यों ये कहानियाँ ज़रूरी हैं?

क्योंकि ये हमें याद दिलाती हैं कि—

* सशक्तिकरण का अर्थ केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानना है।
* बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि बदलाव और निर्माण की धुरी हैं।
* सीमाएँ चाहे आर्थिक हों, शारीरिक हों या सामाजिक — संकल्प के आगे टिक नहीं पातीं।

जब रिया बल्ला उठाती हैं, कनिष्का मैट पर गिरकर फिर उठती हैं, रक्षिता परीक्षा में शीर्ष आती हैं, कशिश प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालती हैं, शैरी मंच पर ग्रेस दिखाती हैं, निर्मल आवाज उठाती हैं, ज्योति शोध करती हैं, सोनिया लिखती हैं और रीना संवाद रचती हैं — तब वे सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि हर उस लड़की के लिए रास्ता बना रही होती हैं जिसे कहा जाता है कि “तुम नहीं कर पाओगी।”

आज की भारतीय बेटियाँ इतिहास नहीं सिर्फ पढ़ रही हैं — वे इतिहास लिख रही हैं, और भविष्य गढ़ भी रही हैं।
आइए, इस बदलाव को केवल सराहें नहीं, बल्कि उसका हिस्सा बनें। क्या हम अपनी बेटियों को सपने देने के साथ-साथ उनके सपनों को उड़ान भी देंगे?

सृजक