कविता
डॉ नाज़ परवीन

कविता

लिखना अवश्य! 

तुम लिखना इतिहास उन लोगों का

जिन्होंने अहिंसा की कसमें खाई थीं

हाथों में किताब, नारा इंकलाब

फिर भी सर में लाठियाँ खाई थीं

 

तुम लिखना जवाब लाठियों का

जो खुद भी खून से नहाई थीं

मासूमों की चीखें सुन खुद

भारत माता भी कराही थी

 

तुम लिखना हिसाब रोटियों का

जो दूर देश से आईं थीं

किसी ने मरहम लगाया, किसी ने पानी पिलाया

किसी ने मिठाई खिलाई थी

 

तुम लिखना ‘लाला ‘ मरा नहीं

उसने फिर लाठियाँ अंग्रेजों की खायी थीं

ताबूत में आखिरी कील बनेगी

हर चीख में यही दुहाई थी

 

तुम लिखना इतिहास उन लोगों का

जिन्होंने अहिंसा की कसमें खाई थीं

वो डटे रहे मैदानों में,

बारिश और तूफानों में,

फिर याद भगत सिंह की आई थी

फिर याद भगत सिंह की आई थी

 

देखी थी हमने तस्वीर पुरानी

क्या ये वही डायर था? जिसने

निहत्थों पर गोली बरसाई थी

तुम लिखना इतिहास उन लोगों का

जिन्होंने अहिंसा की कसमें खाई थीं।।

 

हड्डी टूटी, फटी कमीजें

गिरते पड़ते लोगों की तस्वीरें सामने आईं थीं

हुक्मरानों ने ये लिख डाला

ये अपने थोड़ी थे

ये तो और देश के दंगाई हैं

तुम लिखना इतिहास उन लोगों का

जिन्होंने अहिंसा की कसमें खाई थी ।।

रचयिता

 

डॉ नाज़ परवीन ✍️