कविता
प्रमिला त्रिवेदी जी, स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन, बेंगलुरु महिला प्रकोष्ठ

कविता

संवाद

ठंडी हवा बोली—
“मैं कहाँ से आई हूँ, जानते हो?”
पेड़ बोले—
“हमारी शाखाओं से गुजरकर।”
नदी बोली—
“मेरे किनारे से होकर।”
पहाड़ बोले—
“हमारी चोटियों को छूकर।”
मनुष्य बोला—
“तुम इतनी सुकून भरी क्यों हो?”
हवा बोली—
“क्योंकि प्रकृति से होकर आती हूँ।”
मनुष्य ने गहरी साँस ली।
हवा बोली—
“मुझे स्वच्छ रखना,
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी
मेरा स्पर्श महसूस कर सकें।”
अरावली की गोद में
अरावली बोली—
“मैंने सदियों को देखा है।”
बादल बोले—
“हम तुम्हारी चोटियों पर ठहरने आए हैं।”
पहाड़ बोला—
“ठहरो, मेरे माथे को शीतल कर दो।”
ठंडी हवा बोली—
“मैं भी साथ हूँ।”
पेड़ बोले—
“हम धरती को थामे हुए हैं।”
मनुष्य बोला—
“यह दृश्य कितना सुंदर है!”
अरावली बोली—
“सुंदरता देखने के लिए आँखें नहीं,
संवेदना चाहिए।”
मनुष्य चुपचाप प्रकृति को निहारता रहा।

रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी जी, स्थानीय संपादिका, उलझन सुलझन, बेंगलुरु महिला प्रकोष्ठ

प्रस्तुति

उलझन सुलझन